आर्य समाज की स्थापना किसने और कब की थी | आर्य समाज के 10 नियम क्या है

आर्य समाज की स्थापना किसने और कब की थी | arya samaj ki sthapna kisne aur kab ki thi – हिन्दू धर्म दुनिया के प्राचीन धर्मो में से एक है. समय-समय पर अनेक दुष्ट आत्माओ ने हिन्दू धर्म को नुकसान पहुचाने की कोशिश की है. लेकिन कोई इसमें सफल नहीं हो पाया है. आज भी हिन्दू धर्म अपने आदर्शो और संस्कारो के लिए दुनिया भर में जाना जाता है. इसके पीछे उन महान लोगो की मेहनत और परिश्रम है. जिन्होंने हिन्दू धर्म की रक्षा करने के लिए संघर्ष किया है.

इस आर्टिकल में हम ऐसे ही समाज और वैदिक संस्थान आर्य समाज के बारे में जानेगे. इस आर्टिकल के माध्यम से हम आपको बताएगे की आर्य समाज ने किस प्रकार हिन्दू धर्म और  वैदिक धर्म का प्रचार दुनियाभर में किया थे. इसके साथ आप इस आर्टिकल में आर्य समाज की मान्यता और सिद्दांत भी जानेगे.

आर्य समाज की स्थापना किसने और कब की थी | arya samaj ki sthapna kisne aur kab ki thi

आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी. तथा यह एक हिंदू सुधार आंदोलन है. स्वामी दयानंद सरस्वती को आर्य समाज की स्थापना की प्रेरणा मथुरा के स्वामी विरजानन्द से प्राप्त हुई थी. आर्य समाज को मानने वाले लोग वैदिक परंपराओं में विश्वास करते है. तथा आर्य समाज के लोग मूर्ति पूजन, अवतारवाद, अंधविश्वास और कर्मकाण्ड को पूरी तरीके से नकारते हैं, आर्य समाज के लोग जातिवाद और छुआछुत जैसी सामाजिक बीमारी का विरोध करते हैं.

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आर्य समाज स्त्रियों और शुद्रो को वेद का अध्ययन करने और यज्ञ करने का अधिकार देता है. स्वानी दयानन्द सरस्वती द्वारा लिखित सत्यार्थ प्रकाश नामक आर्य समाज का प्रमुख पतित्र और मान्य ग्रन्थ है. इस समाज का आदर्श वाक्य “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” है. जिसका हिंदी अनुवाद ‘पुरे विश्व को आर्य बनाते चलते चलो” है.

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आर्य समाज का इतिहास

10 अप्रैल 1875 में वर्तमान मुंबई में स्वामी दयानंद सरस्वती ने आर्यसमाज की स्थापना की थी. इसकी स्थापना से पहले भी स्वामी जी के द्वारा वर्तमान बिहार में आरा नामक स्थान पर 7 सितम्बर 1872 में आर्य समाज की स्थापना कर दी थी. लेकिन यह आर्य समाज लम्बे समय तक नहीं रह पाया और स्वामी के द्वारा बिहारी छोड़ने के बाद इसका अस्तित्व ख़त्म हो गया था. उसके पश्चात् तिन वर्ष बाद स्वामी जी ने बम्बई में आर्य समाज की स्थापना की थी.

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आर्य समाज की मूर्ति पूजा को लेकर मान्यता | आर्य समाज के सिद्दांत

आर्य समाज का मानना है की ईश्वर निराकार है. तथा ईश्वर का सर्वोतम और निज नाम “ओम” है. ओम में सभी गुण विधमान है. इसलिए ओम का नाम ही ब्रह्मा, विष्णु, महेश, गणेश देवी, अग्नि, शनि है. इसलिए अलग अलग नामो से मूर्ति पूजा करना उचित नहीं है. आर्य समाज वर्णव्यवस्था को कर्म के आधार पर मानता है. आर्य समाज जन्म के आधार पर वर्णव्यवस्था को स्वीकार नहीं करता है.

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आर्य समाज के अनुसार सृष्टि की उत्पत्ति का काल चार अरब 32 करोड़ साल है. तथा इतना ही समय सृष्टि के पलय का भी है. आर्य समाज वैदिक धर्म को दुरी दुनिया में स्थापित करने में प्रयासरत है. तथा उनके वैदिक राष्ट्र में मांस, मदिरा, बीडी, सिगरेट, चाय, मिर्च -मसाले की कोई जगह नहीं है.

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आर्य समाज के 10 नियम क्या है

आर्य समाज के 10 नियम निम्नलिखित है:

  1. सभी को सिर्फ अपने खुद के हित से सतुष्ट नहीं होना चाहिए. बल्कि ऐसे कार्य करने चाहिए जिससे पुरे समाज की तरक्की हो सके.
  2. समाज में अविधा का नाश और विधा की वृद्दि करनी चाहिए.
  3. इन्सान को प्रत्येक कार्य धर्मानुसार करने चाहिए. अर्थात इन्सान को प्रत्येक कार्य सत्य और असत्य को ध्यान में रख कर करने चाहिए.
  4. मनुष्य को हमेशा सत्य को ग्रहण करने और असत्य को त्यागने के लिए तैयार रहना चाहिए.
  5. वेदों में सत्य है और वेदों में सत्य विधाए है. वेद का अध्धयन करना प्रत्येक आर्य का अधिकार है.
  6. ईश्वर निराकर, सत्य, पवित्र, दयालु, अनुपम, अनादी, सर्वव्यापक, सर्वाधार, न्यायकारी, अमर, अभय और सृष्टिकर्ता है. और उनकी ही उपासना करनी चाहिए.
  7. जो सत्य विधा और प्रदार्थ विधा से जाने जाते है. उन सबका का आदिमूल परमेश्वर है.
  8. संसार में मनुष्य का उद्देश्य शारीरिक, मानसिक और धार्मिक उन्नति करना ही है.
  9. मनुष्य को इस संचार में सबके साथ प्रीतीपूर्वक, धर्मानुसार और यथायोग्य व्यवहार करना चाहिए.
  10. सब लोगो को सामाजिक, सर्वहितकारी, नियम पालने में परतंत्र रहना चाहिए. सबको सबके हित के नियम पालने चाहिए.

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आर्य समाज का समाज के उत्थान में क्या योगदान है

आर्य समाज का वर्षो से समाज के उत्थान में बहुत महत्वपूर्ण योगदान रहा है. जिसे हम निचे बिन्दुओ में समझेगे:

  • आर्य समाज ना केवल एक धार्मिक संस्थान है. बल्कि यह एक धार्मिक समाज सुधारक और राष्ट्र प्रेम को जागृत करने वाला आन्दोलन है. भारतीय स्वंत्रता संग्राम में अधिकतम स्वंत्रता सेनानी आर्य समाज से थे.
  • स्वामी दयानंद सरस्वती ने धर्म परिवर्तित कर चुके लोगो को फिर से हिन्दू धर्म अपनाने के लिए प्रेरित किया और पुरे देश में शुद्दी आन्दोलन को चलाया.
  • आज “नमस्ते” शब्द का उपयोग विदेशी लोग भी अभिवादन करने के लिए करते है. लेकिन आपको यह जानकर हैरानी होगी. की पहले नमस्ते शब्द का उपयोग भारतीय लोग भी नहीं करते थे. स्वामी जी ने भारतीय सभ्यता और संस्कार को फिर से जागृत किया. और पुरे विश्व में भारतीय संस्कार और आदर्श का प्रचार किया था.
  • वर्ष 1886 में लाहौर में स्वामी के अनुयाय लाला हंसराज ने दयानंद एग्लो वैदिक कॉलेज की स्थापना की थी.
  • वर्ष 1901 में आर्य समाज के सदस्य स्वामी श्राध्दनन्द ने कागदी नामक स्थान पर गुरुकुल विधालय की स्थापना की थी.
  • आर्य समाज के सदस्यों ने विदेशो में जाकर हिंदी भाषा और राष्टीय चेतना का प्रसार किया.
  • स्वामी दयानंद सरस्वती द्वारा रचित पुस्तक सत्यार्थ पुस्तक ने समाज में देश प्रेम, हिंदी भाषा और हिन्दू धर्म की अलख जगाई थी.

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निष्कर्ष

इस आर्टिकल (आर्य समाज की स्थापना किसने और कब की थी | arya samaj ki sthapna kisne aur kab ki thi) को लिखने का हमारा उद्देश्य आपको आर्य समाज और उनके योगदान के बारे में विस्तार से जानकारी देना है. आर्य समाज की स्थापना स्वामी दयानंद सरस्वती ने 1875 में की थी. तथा यह एक हिंदू सुधार आंदोलन है. स्वामी दयानंद सरस्वती को आर्य समाज की स्थापना की प्रेरणा मथुरा के स्वामी विरजानन्द से प्राप्त हुई थी.

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आपको यह आर्टिकल (आर्य समाज के 10 नियम क्या है) कैसा लगा हैं. यह हमे तभी पता चलेगा जब आप हमे निचे कमेंट करके बताएगे. यह आर्टिकल विभिन्न प्रतियोगिता परीक्षाओ की दृष्टी से भी महत्वपूर्ण हैं. इसलिए इस आर्टिकल को उन लोगो और दोस्तों तक पहुचाए जो प्रतियोगिता परीक्षा की तैयारी कर रहे हैं. क्योंकि ज्ञान बाटने से हमेशा बढ़ता हैं. धन्यवाद.

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