मिट्टी कितने प्रकार की होती हैं | Mitti kitne prakar ki hoti hai

मिट्टी कितने प्रकार की होती हैं | mitti kitne prakar ki hoti hai – किसी भू भाग पर फसल की मात्रा, गुणववत्ता और प्रकार वह की मिट्टी निर्धारित करती हैं. मिट्टी खेती की दृष्टी से बहुत महत्वपूर्ण विषय हैं. इसी वजह से हमारे देश के कृषि अनुंसधान संस्थान ने मिट्टी को उनमे उपस्थित उपयोगी तत्वों के आधार पर अनेक प्रकार में विभाजित किया हैं. इस आर्टिकल में हम जानेगे की मिट्टी कितने प्रकार की होती हैं | mitti kitne prakar ki hoti hai . तथा प्रत्येक मिट्टी के प्रकार के बारे में विस्तार से अध्ययन करेगे.

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पृथ्वी की सरचना में मिट्टी का योगदान

पृथ्वी की ऊपरी परत मिट्टी से बनी होती है. मिट्टी का निर्माण छोटे-छोटे चट्टानों के कणों, खनिज बैक्टीरिया, जैविक पदार्थ इत्यादि के मिश्रण से होता है. धरती के अंदर मिट्टी की अनेक परतें होती हैं. जिसमें सबसे ऊपरी परत में मिट्टी के छोटे से कण, पेड़, पौधे और जीवो के अवशेष होते हैं. जो की खेती करने और फसलों के उत्पादन के लिए महत्वपूर्ण होते हैं.

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दूसरी परत में चिकनी मिट्टी होती है. तथा इसके पश्चात् चट्टानों और मिट्टी का मिश्रण होता है. इसके बाद में सबसे आखिरी परत में कठोर चट्टान मौजूद होती हैं. मिट्टी की गहराई सभी जगह पर अलग-अलग होती है. तथा हमारे देश में मिट्टी की गहराई 30 मीटर तक हो सकती है.

मिट्टी कितने प्रकार की होती हैं | mitti kitne prakar ki hoti hai

मिट्टी अनेक प्रकार की होती है. और प्रत्येक मिट्टी की अपनी अलग विशेषताएं होती हैं. मिट्टी में मौजूद रासायनिक और जैविक तत्व मिट्टी को विशेष बनाते हैं. क्योंकि इनसे ही मिट्टी कीतनी उपजाऊ हैं. इसका पता चलता हैं. सबसे उपजाऊ मिट्टी जलोढ़ मिट्टी होती है. जिसमें पोटेशियम की मात्रा प्रचुर मात्रा में उपलब्ध होती है. यह मिट्टी धान और गन्ना जैसी की फसल के लिए प्रयोग में ली जाती है.

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लाल मिट्टी में लोहे की मात्रा अधिक होती है. जिसके कारण इसका उपयोग मूंगफली, चना और अरंडी की खेती में किया जाता है. वही काली मिट्टी में मैग्निशियम ,पोटेशियम और कैल्शियम होता है. और इस में नाइट्रोजन की मात्रा बहुत कम होती है. जिसके कारण कपास, ज्वार, रागी और तंबाकू की फसलें इसमें अच्छी तरह से उत्पाद की जाती है.

दूसरी ओर रेतीली मिट्टी में पोषक तत्वों की कमी होती है. इसी कारण इसका उपयोग अधिक वर्षा क्षेत्रो में काजू और नारियल के पेड़ों के विकास के लिए किया जाता है.

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हमारे देश के ‘कृषि अनुसंधान संस्थान’ ने भारत में पाई जाने वाली मिट्टी को 8 भागों में विभाजित किया है. यह 8 भाग निम्न प्रकार से हैं:

  • लाल मिट्टी
  • काली मिट्टी
  • कांप मिट्टी
  • लैटेराइड मिट्टी
  • शुष्क मृदा
  • लवण मृदा या क्षारीय मिट्टी
  • पीतमय या जैव मृदा
  • पर्वतीय मिट्टी

लाल मिट्टी किसे कहते हैं

लाल मिट्टी का रंग लाल और चॉकलेटी होता है. यह मिट्टी चट्टानों के टुकड़े से बनी होती है. अगर लाल मिट्टी गीली हो जाए तो यह हल्की पीली दिखती हैं. लाल मिट्टी में लोहा, एलुमिनियम और चुना प्रचुर मात्रा में मौजूद होता है. इस मिट्टी का उपयोग दाल, गेहूं, कपास और मोटे अनाज को उगाने में किया जाता है. लाल मिट्टी बाजरे की फसल के लिए बहुत लाभकारी है.

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लाल मिट्टी हमारे देश के राजस्थान, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, पश्चिम बंगाल, झारखंड छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश राज्य में प्राप्त होती है. भारत के 5.18 लाख वर्ग किलोमीटर में लाल मिट्टी पाई जाती है. इस मिट्टी में नाइट्रोजन और फास्फोरस की मात्रा बहुत कम होती है. तथा इस मिट्टी का लाल रंग आइरन ऑक्साइड की वजह से होता है.

काली मिट्टी किसे कहते हैं

काली मिट्टी में नाइट्रोजन और पोटाश बहुत कम मात्रा में होता है. लेकिन यह मिट्टी कपास की खेती के लिए बहुत लाभकारी है. इसी कारण इस मिट्टी को कपास मिट्टी भी कहा जाता है. इस मिट्टी में चूना, लोहे के तत्व,  मैग्निशियम तथा कार्बनिक पदार्थों की कमी होती है. और इस मिट्टी का काला रंग जीवांश और टीटेनीफेरस मैग्नेटाइड की वजह से होता है. काली मिट्टी अपने रंग के कारन आपको अलग से दिख जाती हैं.

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काली मिट्टी ज्वालामुखी से निकलने वाले लावा से बनती है. और भारत में लगभग 5 लाख वर्ग किलोमीटर पर काली मिट्टी फैली हुई है. हमारे देश के महाराष्ट्र राज्य में यह मिट्टी सबसे अत्यधिक पाई जाती है. इस मिट्टी में तंबाकू, मूंगफली, सोयाबीन, ज्वार, रेंडी, केला और गन्ना मुख्य रूप से पैदा होता है.

कांपा मिट्टी किसे कहते हैं

कांपा मिट्टी भारत में उत्तर के विशाल मैदान और प्रायद्वीपीय भारत के तटीय मैदानों में पाई जाती है. यह मिट्टी कृषि की दृष्टि से बहुत उपजाऊ होती है. और इसे जलोढ़ या क्षारीय मिट्टी भी कहा जाता है. हमारे देश में लगभग 40% भाग पर कांपा मिट्टी पाई जाती हैं.

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कांपा मिट्टी गंगा, यमुना, ब्रह्मपुत्र, घाघरा और इसकी सहायक नदियों के द्वारा लाई जाती हैं. इस मिट्टी में कंकड़ की मात्रा बिल्कुल कम होती हैं. तथा इस मिट्टी में फास्फोरस, नाइट्रोजन और वनस्पति अंशो की कमी होती है.

जलोढ़ मिट्टी भी दो प्रकार की होती हैं खादर जलोढ़ और नवीन जलोढ़. खादर जलोढ़ मिट्टी वह मिट्टी जो नदियों के द्वारा बहा कर लाई गई होती हैं और दूसरी नवीन जलोढ़ मिट्टी यह मिट्टी खेती के लिए अधिक उपयोगी होती हैं.

कांपा मिट्टी का उपयोग ज्वार, काबुली चना, कपास, चावल, गेहूं, बाजरा, काला चना, हरा चना, सोयाबीन, मक्का, सरसों, मूंगफली आदि की खेती के लिए किया जाता हैं.

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लैटेराइट मिट्टी किसे कहते हैं

लैटेराइट मिट्टी  उन भागों में पाई जाती हैं. जहा मौसम शुष्क और बार-बार बारिश वाला होता है. लैटेराइट मिट्टी का निर्माण चट्टानों के टूटने से होता है. इस मिट्टी में अधिक मात्रा में लोहा, एल्युमीनियम, पोटाश और चूना होता है. लैटेराइट मिट्टी का रंग लाल होता है. तथा इसके अम्लीय गुण के कारण इसका उपयोग चाय और कॉपी की खेती में प्रचुर मात्रा में किया जाता है.

भारत में यह मिट्टी कई स्थानों पर प्राप्त होती है. हमारे देश में लैटेराइट मिट्टी तमिलनाडु के बड़े भाग, केरल के समुद्र तट के आसपास, महाराष्ट्र और उड़ीसा के राज्यों में मिलती है.

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लैटेराइट मिट्टी का उपयोग घरों के निर्माण में भी किया जाता है. यह मिट्टी बहुत प्राचीन काल से उपलब्ध है. कहीं-कहीं पर इस मिट्टी के अंदर प्राचीन काल के औजार भी प्राप्त होते हैं.

भारत में प्राप्त लैटेराइट मिट्टी को दो भाग उच्चस्तरीय और निम्नस्तरीय में बांटा गया है. ऊपरी सतह से 2000 फुट की गहराई पर उपस्थित लैटेराइट मिट्टी को उच्चस्तरीय लैटेराइट मिट्टी कहां जाता है. तथा इसके नीचे गहराई में पाई जाने वाली मिट्टी को निम्न स्तरीय लैटेराइट मिट्टी नाम दिया गया है.

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शुष्क मृदा किसे कहते हैं

शुष्क मृदा को रेगिस्तानी मिटटी भी कहा जाता है. यह मिट्टी शुष्क प्रदेश या अर्ध शुष्क प्रदेश में पाई जाती हैं. तथा इस मिट्टी में बहुत कम वनस्पति पाई जाती है. क्योंकि इस मिट्टी में पानी की मात्रा बहुत कम होती हैं. इसके साथ ही इस मिट्टी में नाइट्रोजन और कार्बनिक पदार्थों की मात्रा भी कम होती है.

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रेगिस्तानी मिटटी में जिप्सम, कैल्शियम कार्बोनेट, सोडियम सिलीकेट इत्यादि खनिज मौजूद होते हैं. तथा इस मिट्टी का उपयोग बाजरा और ज्वार जैसे दलहन की फसल के उत्पादन के लिए किया जाता है.

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लवण मृदा या क्षारीय मिट्टी किसे कहते हैं

लवण मृदा या क्षारीय मिट्टी में क्षार और लवण प्रचुर मात्रा में पाए जाते हैं. तथा शुष्क जलवायु वाले स्थानों पर इस मिट्टी के लवण भूरे और श्वेत रंग में आसानी से दिख जाते हैं. इस मिट्टी में लवण की वनस्पति के अलावा कोई भी वनस्पति नहीं पाई जाती हैं. यह मिट्टी हमारे देश में तमिलनाडु आंध्रप्रदेश, पंजाब, महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश राज्य में पाई जाती हैं.

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चावल तथा जौ की खेती के लिए यह मिट्टी का उपयोग किया जाता है. इस मिट्टी में घुलनशील लवणों की मात्रा होने के कारण पौधे के विकास को प्रभावित करती है. इस मिट्टी के अंदर मैग्नीशियम और कैल्शियम अधिक मात्रा में पाए जाते हैं.

लवण मिट्टी को अच्छे पानी की मदद से खेती के योग्य बनाया जा सकता है. लेकिन इसके लिए काफी प्रयास की जरूरत होती है और इसके लिए लवणीय मिट्टी में उपस्थित लवणों को अच्छे पानी के द्वारा बहाना पड़ता है. लवणीय मृदा को आसानी से पहचाना जा सकता है.

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पीतमय या जैव मृदा किसे कहते हैं

जैव मृदा को दलदली मृदा भी कहा जाता है. यह मृदा भारत के केरल, उत्तराखंड और पश्चिमी बंगाल राज्य में प्राप्त होती है. इस मिट्टी के अंदर पोटाश और फास्फोरस की मात्रा बहुत कम होती है. तथा इस मिट्टी में लवण की मात्रा अधिक होती हैं. लेकिन यह मिट्टी फसलों के लिए बहुत अच्छी मानी जाती हैं.

पर्वतीय मिट्टी किसे कहते हैं

पर्वतीय मिट्टी के अंदर कंकड़ और चट्टानों के टुकड़े अधिक मात्रा में होते हैं. इस मिट्टी के अंदर चूना, फास्फोरस और पोटाश की कमी होती है. पहाड़ी क्षेत्रो पर पर्वतीय मिट्टी पाई जाती है. इस मिट्टी के अंदर झूम की खेती की जाती है. नागालैंड में मुख्य रूप से इसी मिट्टी के अंदर खेती की जाती हैं.

पर्वतीय मिट्टी को मुख्य रूप से तीन भागों में विभाजित किया गया है.

  • पथरीली मिट्टी
  • चूनायुक्त मिट्टी
  • आग्नेय मिट्टी

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पथरीली मिट्टी

यह मिट्टी हिमालय के दक्षिण भाग में पाई जाती हैं. तथा इसमें चूना और पोटेशियम की कमी होती है. इस मिट्टी में चाय की खेती की जाती है.

चूनायुक्त मिट्टी

चकराता, मसूरी और नैनीताल क्षेत्रों से चूनायुक्त मिट्टी प्राप्त की जाती है. वर्षा की अधिकता के कारण यहां पर चावल की खेती भारी मात्रा में की जाती हैं. और यहां पर केवल चीड और साल के पेड़ ही देखने को मिलते हैं.

आग्नेय मिट्टी

आग्नेय मिट्टी पहाड़ी भागों में ज्यादा पाई जाती हैं. तथा ज्वालामुखी के लावे से इस मिट्टी का निर्माण होता है. इस मिट्टी में नमी को धारण करने की अच्छी क्षमता होती है. इसी कारण यह मिट्टी खेती के लिए प्रयुक्त मानी जाती है.

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निष्कर्ष

इस आर्टिकल (मिट्टी कितने प्रकार की होती हैं | mitti kitne prakar ki hoti hai) को लिखने का हमारा उद्देश्य आपको मिट्टी के प्रकार के बारे में विस्तार से जानकारी देना हैं. हमारे देश के ‘कृषि अनुसंधान संस्थान’ ने भारत में पाई जाने वाली मिट्टी को 8 भागों में विभाजित किया है. इस आर्टिकल में हमने प्रत्येक मिट्टी के बारे में विस्तार से जानकारी दी हैं. पृथ्वी की ऊपरी परत 30 मीटर की गहराई तक सिर्फ मिट्टी से बनी होती हैं.

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